Wednesday, October 12, 2016

A thorny affair

I brushed past a pretty rose bush,
upright it grew in the perfumed air.
Hiding beneath was a thorn lying in ambush,
and pricked me causing the skin to tear.

I went too close for its comfort,
losing every sense of mine.
The prick causing a great discomfort,
the blood flowing in a thin line.

The joy of the moment was momentary,
the thorn had its way, and the blood had its.
I lay there in pain and agony,
sitting there gathering my wits.

The rose had another day to call its own,
another day to bloom.
Another day to crown a thorn,
waiting there in ambush.

© 2014 Abhijit Pandit

जिस रात के ख्वाब नहीं

जिस रात के ख्वाब नहीं, उस रात के अंधेरोमें मै क्या देखु।

वो उमंग भी नहीं, वो अरमान भी नहीं,
जिसकी धरती से उठती थी वो ख्वाबों की महक।
वो महक जो बिखर जाती थी यूँ,
की खिल उठती थी वो हर रात किसी महफ़िल की तरह,
और रोशन हो उठते थे वो हर ख्वाब किसी जुगनू की तरह।

अब वो महफ़िल भी नहीं, वो जुगनू भी नहीं,
जिसमे डूब के मदहोश हो उठती थी वो हर रात
और खो जाती थी यूँ,
की खो जाए लहर किसी सागर में जैसे।

अब वो लहर भी नहीं, वो सागर भी नहीं,
जो चांदनी में नहाके थिरक उठते थे,
और नाच उठते थे वो सितारों की महफ़िल में जैसे।

अब वो चांदनी भी नहीं, वो सितारे भी नहीं,
जिनके पड़ते ही फुट पड़ते थे वो ख्वाब,
किसी खुशबू की तरह

है तो बस एक काली सी... अँधेरीसी रात,
जो भोर की नहीं, किसी ख्वाब के इंतज़ार में थी शायद।
की कब आकर कोई आवारासा ख्वाब उसमे बस जाए,
और झूम उठे वो भी, सावन में नाचते उस मोर की तरह

वो रात जो अकेलीसी चली जा रही थी
अकेली सी... मायूससी... तनहासी...
वो अँधेरे की तन्हाइयों में गुम होती जा रही थी

कितना लंबा सफर था उस रात का,
वो रात, जिस रात के ख्वाब नहीं।


© २०१६ अभिजीत पंडित