Wednesday, October 12, 2016

जिस रात के ख्वाब नहीं

जिस रात के ख्वाब नहीं, उस रात के अंधेरोमें मै क्या देखु।

वो उमंग भी नहीं, वो अरमान भी नहीं,
जिसकी धरती से उठती थी वो ख्वाबों की महक।
वो महक जो बिखर जाती थी यूँ,
की खिल उठती थी वो हर रात किसी महफ़िल की तरह,
और रोशन हो उठते थे वो हर ख्वाब किसी जुगनू की तरह।

अब वो महफ़िल भी नहीं, वो जुगनू भी नहीं,
जिसमे डूब के मदहोश हो उठती थी वो हर रात
और खो जाती थी यूँ,
की खो जाए लहर किसी सागर में जैसे।

अब वो लहर भी नहीं, वो सागर भी नहीं,
जो चांदनी में नहाके थिरक उठते थे,
और नाच उठते थे वो सितारों की महफ़िल में जैसे।

अब वो चांदनी भी नहीं, वो सितारे भी नहीं,
जिनके पड़ते ही फुट पड़ते थे वो ख्वाब,
किसी खुशबू की तरह

है तो बस एक काली सी... अँधेरीसी रात,
जो भोर की नहीं, किसी ख्वाब के इंतज़ार में थी शायद।
की कब आकर कोई आवारासा ख्वाब उसमे बस जाए,
और झूम उठे वो भी, सावन में नाचते उस मोर की तरह

वो रात जो अकेलीसी चली जा रही थी
अकेली सी... मायूससी... तनहासी...
वो अँधेरे की तन्हाइयों में गुम होती जा रही थी

कितना लंबा सफर था उस रात का,
वो रात, जिस रात के ख्वाब नहीं।


© २०१६ अभिजीत पंडित