Friday, July 18, 2014

वो बुँदे

आज देखा है हमने भी गुज़रते हुए उन घनी वादियों से,
वो टपकती हुई बुँदे।
पेड़ो की शाख से सरकती हुई, पत्तो के गाल को चूमती हुई,
बैठी हुई.... नाचती हुई.... 
वो नटखटसी बुँदे।

वो बुँदे जो समेटे हुए थी अपनेमें, न जाने कितनी ही कहानियाँ,
कहानियाँ जो बयां कर रही थी
वो मौसमों की रंगीनियाँ.... वो घटाओ की शोखियां....
वो कहानियाँ पढ़ी है हमने भी देखके,
वो मचलती हुई बुँदे।

वो बुँदे जिसमे झलकता था शबाब उन काली घटाओं का,
शबाब, जो बरस रहा था होके बेशुमार, वो सावन की पुहारों से,
और मदहोश हो उठती थी पड़ते ही, वो प्यासी धरती,
जो महेक उठती थी इक भीनी भीनी खुशबू से।
वो खुशबू को साँसों में लिया है हमने भी देखके,
वो चमकती हुई बुँदे।

वो बुँदे जो समेटे हुए थी अपनेमें न जाने कितने ही नज़ारे,
वो नज़ारे जो ओज़ल हो जाते थे कभी उस धुंध में,
और निकल आते थे कभी, होके रोशन, वो बादलों के छटने से,
वो नज़ारोंकी अटखेलियां महसूस की है हमने भी देखके,
वो प्यारीसी बुँदे। 

मैंने भी ली है उन बूंदों को अपनेमें कहीं,
और संजोये रक्खी है मैंने उनको, वो पलकों के पीछे।
याद आते ही वो मंज़र, नम हो उठती है आँखे उन बूंदो से,
और डरने लगता हूँ मै, की कहीं सरक न जाये.... गिर न जाए उन आँखों से,
वो चंचल सी.… नाज़ुक सी..... शर्मीली बुँदे।



© २०१४ अभिजीत पंडित

Saturday, July 12, 2014

मौसम का जादू

ज़ुल्फ़ें आज कुछ बिखरी हुई है आसमानों की,
काले बादलों ने घेरा है आज सारा जहां।
उठी यूँ एक सोंधी सोंधी सी खुशबू मिटटी की,
ऐसा नशा कुदरत का देखा है तुमने और कहाँ?

बिजली के कड़कने से गूंज उठी है सारी फ़िज़ाए,
भीगी भीगी सी रुत है, जहां देखो वहां वहां।
उड़ती हवाए भी आज ख़ुशी से ज़ूम रही है,
लहरा रहै है खेत भी, जहां देखो वहां वहां।

गुनगुनाते भवरोंने छेड़ा है एक राग सुरीला,
नाचे मयूर बोलो तो अब कहाँ कहाँ।
मेंढक की ड्रॉऊँ ड्रॉऊँसे डोल उठा है चमन सारा,
ऐसा संगीत कुदरत का सुना है तुमने और कहाँ?

मोती सी चमकने लगी है बुँदे उन पत्तो पे,
ऐसा निखार देखा है तुमने और कहाँ।
चोटियों से लिपट गए है आवारासे बादल,
ऐसा मिलन कुदरत का देखा है तुमने और कहा?

मदहोश झरना भी बहने लगा है आज कुछ नशे में,
गिरती नदी की फुहारे उड़ने लगी है जहां-तहाँ।
इन्द्रधनुष के रंगो से रंग गयी है आज सारी दिशाए,
हरियाली ओढ़े हुए है आज सारी सृष्टि, नज़र उठाओ जहां जहां।

© २०१४ अभिजीत पंडित

Friday, July 4, 2014

Bird, oh bird!!!

Bird, oh bird, of wings and tail,
soaring high on a roaring gale.

Bird, oh bird, of wings and tail,
tiny to scale but up like a sail.

Bird, oh bird, of wings and tail,
so little a frame, but not so frail.

Bird, oh bird, of wings and tail,
flying high over a rolling vale.

Bird, oh bird, of wings and tail,
tearing with its beak, the misty veil.

Bird, oh bird, of wings and tail,
born so wild, but yet so tame.

Bird, oh bird, of wings and tail,
singing a song with a weaving tale.

Bird, oh bird, of wings and tail,
'tis a song divine and a fleeting tale.

© 2014 Abhijit Pandit