Saturday, July 12, 2014

मौसम का जादू

ज़ुल्फ़ें आज कुछ बिखरी हुई है आसमानों की,
काले बादलों ने घेरा है आज सारा जहां।
उठी यूँ एक सोंधी सोंधी सी खुशबू मिटटी की,
ऐसा नशा कुदरत का देखा है तुमने और कहाँ?

बिजली के कड़कने से गूंज उठी है सारी फ़िज़ाए,
भीगी भीगी सी रुत है, जहां देखो वहां वहां।
उड़ती हवाए भी आज ख़ुशी से ज़ूम रही है,
लहरा रहै है खेत भी, जहां देखो वहां वहां।

गुनगुनाते भवरोंने छेड़ा है एक राग सुरीला,
नाचे मयूर बोलो तो अब कहाँ कहाँ।
मेंढक की ड्रॉऊँ ड्रॉऊँसे डोल उठा है चमन सारा,
ऐसा संगीत कुदरत का सुना है तुमने और कहाँ?

मोती सी चमकने लगी है बुँदे उन पत्तो पे,
ऐसा निखार देखा है तुमने और कहाँ।
चोटियों से लिपट गए है आवारासे बादल,
ऐसा मिलन कुदरत का देखा है तुमने और कहा?

मदहोश झरना भी बहने लगा है आज कुछ नशे में,
गिरती नदी की फुहारे उड़ने लगी है जहां-तहाँ।
इन्द्रधनुष के रंगो से रंग गयी है आज सारी दिशाए,
हरियाली ओढ़े हुए है आज सारी सृष्टि, नज़र उठाओ जहां जहां।

© २०१४ अभिजीत पंडित