Thursday, September 12, 2013

रात भर


ठहेरे हुए पलकों याद कर
करवटे लेता रहा में रात भर।
कब नींद आएगी,
इंतज़ार करता रहा में रात भर।

आखों के भीतर, उस ठहेरे हुए अँधेरे में,
इन यादो का कारवां यूं गुजरा जैसे,
गुज़र जाए कोई अंजाना मुसाफिर।
क्या मालूम उन्हें, क्या क्या निशाँ छोड़ गए
मेरी यादों की ज़मीन पे रात भर।

कभी तो गुफ्तगू कर उठता था इन यादों से,
वो सेहमे सेहमे से, हलके हलके पल,
आके सिमट जाते थे मेरी बाहों से,
आँखों में आंखे डालकर कहते वो अन्सुनी बातें।
में और मेरी यादों की आवाज़ गूंज उठती थी
उस वीरानेमें रात भर।


© 2013 Abhijit Pandit