Monday, September 10, 2012

आ... की गूम हो जाए

आ... की गूम हो जाए हम इन पहाडो के बीच.
गूम हो जाए.... की गूम हो जाना भी कभी अच्छा लगता है.

गूम हो जाए उन भीगी यादो में.
यादे उन दिनों की, चले थे जब हम वो अनजाने रास्तो पे,
वो रास्ते जो न जाने कहा जा रहे थे.
की अनजाने रास्तो पे भी जाना अच्छा लगता है.

सुने फिरसे वो वादियों में छाया हुआ सन्नाटा,
वो सहमा हुआ सन्नाटा.... जो कांप उठता था, किसी पत्ते की टूटने की आहट से.
की वो सन्नाटो का शोर भी सुनना अच्छा लगता है.

चुमले फिरसे वो पहाडियों की चोटियाँ.
वो चोटियाँ जो न जाने क्यों ढंकी रहती थी उन बादलो के बीच.

वो अल्हड से, आवारा से बादल,
कुछ गुफ्तगू कर रहे थे शायद....
उन चोटियों को भी चूमना अच्छा लगता है.


© 2012 Abhijit Pandit